मनरेगा बना मशीनरेगा: मडकापार में सरपंच-सचिव ने जेसीबी,ट्रैक्टर फवड़ा से मजदूरों का कुचला हक। जेसीबी के बाद अब ट्रैक्टर में फवड़ा लगाकर मुरूम बकराने का काला कारनामा।
31 Jan, 2026
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नायक दर्पण/बालाघाट।
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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) जैसी श्रमिकों को रोजगार देने वाली महत्वाकांक्षी योजना को ग्राम पंचायत मडकापार में सरपंच–सचिव की मिलीभगत से मशीनों का चारागाह बना दिया गया है। पहले जेसीबी मशीन से सुदूर सड़क निर्माण में मुरूम बकराने का मामला सामने आया, और जब शिकायतों के बाद मामला उजागर हुआ तो जिम्मेदारों ने अपनी चालाकी बदल ली। अब खुलेआम ट्रैक्टर में फवड़ा (लोडर) लगाकर मुरूम बकराने का कार्य कराया जा रहा है, जबकि कागजों में दिखाया जा रहा है कि यह पूरा काम मनरेगा के श्रमिकों से कराया गया।
मामला किरनापुर जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत मडकापार का है, जहां मनरेगा योजना के तहत सुदूर सड़क निर्माण कार्य चल रहा है। योजना का मूल उद्देश्य गांव के बेरोजगार मजदूरों को हाथ से काम देकर रोजगार उपलब्ध कराना है, लेकिन यहां मजदूरों की जगह मशीनें पसीना बहा रही हैं और मजदूर केवल रजिस्टरों में जिंदा हैं।
जेसीबी कांड के बाद बदली रणनीति,लेकिन खेल वही
कुछ समय पूर्व इसी सड़क निर्माण कार्य में जेसीबी मशीन से मुरूम बकराने का मामला सामने आया था। शिकायतों के बाद पंचायत के जिम्मेदारों में हड़कंप मचा, लेकिन सुधार की बजाय उन्होंने नई तरकीब निकाल ली। अब जेसीबी की जगह ट्रैक्टर में फवड़ा लगाकर वही काम किया जा रहा है, ताकि ऊपर से देखने में यह कृषि कार्य या सामान्य ट्रैक्टर उपयोग लगे, लेकिन असलियत में यह भी मनरेगा नियमों का खुला उल्लंघन है। स्थानीय ग्रामीणों कि माने तो पूरे निर्माण स्थल पर कहीं भी मजदूरों की कतारें नजर नहीं आतीं न फावड़े-तसले चल रहे हैं और न ही श्रमिकों की उपस्थिति दिखती है। इसके बावजूद पंचायत के दस्तावेजों में दर्जनों मजदूरों की हाजिरी भरी जा रही है और भुगतान निकाला जा रहा है।
*कागजों में मजदूर,जमीन पर मशीन*
मनरेगा के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि सड़क निर्माण जैसे कार्य पूरी तरह श्रम आधारित होंगे। मशीनों के उपयोग पर सख्त प्रतिबंध है, फिर भी ग्राम पंचायत मडकापार में इन नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच,सचिव रोजगार सहायक और उपयंत्री की मिलीभगत से मशीन मालिकों को लाभ पहुंचाया जा रहा है, जबकि वास्तविक मजदूरों को काम से वंचित रखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, मस्टर रोल में जिन मजदूरों के नाम दर्ज हैं, उनमें से कई लोगों ने कभी इस कार्यस्थल पर काम ही नहीं किया। कुछ मजदूरों ने नाम ना छापने के शर्त में यह तक बताया कि उनके नाम से हाजिरी भर दी गई, लेकिन उन्हें न तो काम मिला और न ही पूरी मजदूरी।
प्रशासन की चुप्पी,सवालों के घेरे में जनपद पंचायत
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जनपद पंचायत और संबंधित तकनीकी अमला क्या कर रहा है? क्या बिना जानकारी के यह सब संभव है? या फिर सब कुछ जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है? ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायतें करने के बावजूद न तो मौके पर जांच हुई और न ही जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई की गई। मनरेगा जैसी योजना जिसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, उसी योजना को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाया जा रहा है। मशीनों से काम कराकर जहां एक ओर लागत घटाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर मजदूरी की राशि कागजों में निकालकर बंदरबांट की जा रही है।
सरपंच,सचिव,रोजगार सहायक, उपयंत्री की भूमिका संदिग्ध
ग्राम पंचायत स्तर पर मनरेगा कार्यों की पूरी जिम्मेदारी सरपंच,सचिव,रोजगार सहायक और उपयंत्री की होती है। कार्य स्वीकृति से लेकर क्रियान्वयन और भुगतान तक सब कुछ इन्हीं के हस्ताक्षरों से होता है। ऐसे में बिना उनकी जानकारी के मशीनों से कार्य होना असंभव माना जा रहा है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच हो तो सरपंच,सचिव,रोजगार सहायक और उपयंत्री की भूमिका पूरी तरह उजागर हो जाएगी।
ग्रामीणों की मांग: उच्च स्तरीय जांच और सख्त कार्रवाई
मडकापार के ग्रामीणों ने कलेक्टर, सीईओ जिला पंचायत और राज्य शासन से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। साथ ही दोषी सरपंच,सचिव,रोजगार सहायक और उपयंत्री पर एफआईआर दर्ज कर उन्हें पद से हटाने की मांग भी की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
मनरेगा की आत्मा पर चोट:– मनरेगा केवल एक योजना नहीं बल्कि ग्रामीण गरीबों के सम्मान और अधिकार से जुड़ा कानून है। मशीनों से काम कराकर न केवल कानून का उल्लंघन किया जा रहा है, बल्कि गरीब मजदूरों के हक पर सीधा डाका डाला जा रहा है। ग्राम पंचायत मडकापार का यह मामला यदि यूं ही दबा दिया गया तो यह पूरे जनपद में भ्रष्टाचार को खुली छूट देने जैसा होगा।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मामले में कब तक आंखें मूंदे रहता है या फिर दोषियों पर कार्रवाई कर मनरेगा की साख बचाने का साहस दिखाता है।
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