शिक्षा के मंदिर में नियमों की खुलेआम धज्जियां। हेलमेट अभियान के बीच हाई स्कूल गुडरु से निकली बिना हेलमेट ट्रैक्टर–बाइक रैली,जिम्मेदार बने अनजान।

04 Feb, 2026 180 व्यूज
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नायक दर्पण/बालाघाट।
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एक ओर जिला प्रशासन सड़कों पर हेलमेट पहनने को लेकर जागरूकता अभियान चला रहा है, लोगों को नियमों का पाठ पढ़ाया जा रहा है, चालान काटे जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय गुडरु में नियमों को खुलेआम ताक पर रख दिया गया। बच्चों के भविष्य को संवारने वाले इस संस्थान से बिना हेलमेट ट्रैक्टर और बाइक रैली निकलना न केवल हैरान करता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी और निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
मामला स्कूल में कक्षा 12वीं के विद्यार्थियों की विदाई से जुड़ा है। विदाई कार्यक्रम को यादगार बनाने के नाम पर शिक्षक और विद्यार्थियों ने मिलकर ऐसा आयोजन कर डाला जो कानून और सुरक्षा दोनों के लिए खतरा बन गया। स्कूल परिसर से शुरू हुई यह रैली सीधे मुख्य सड़क तक पहुंची, जहां बच्चों ने बिना हेलमेट बाइक दौड़ाई और ट्रैक्टर पर सवार होकर नियमों की धज्जियां उड़ाईं। हैरानी की बात यह रही कि यहL सब pस्कूल समय और स्कूल परिसर से जुड़े आयोजन के तहत हुआ, फिर भी किसी जिम्मेदार ने रोकने की जरूरत नहीं समझी।

शिक्षा या लापरवाही का प्रदर्शन?
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शिक्षा संस्थानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ किताबें पढ़ाना नहीं बल्कि बच्चों में अनुशासन कानून का सम्मान और जिम्मेदारी की भावना पैदा करना भी है। लेकिन गुडरु स्कूल में जो हुआ उसने यह साबित कर दिया कि यहां बच्चों को नियम सिखाने से ज्यादा नियम तोड़ने की छूट दी गई। जिन शिक्षकों को बच्चों के लिए रोल मॉडल होना चाहिए था, वही शिक्षक इस आयोजन में शामिल रहे। सवाल यह है कि जब शिक्षक स्वयं नियमों की अनदेखी करेंगे तो बच्चों से कानून पालन की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

प्रशासन के हेलमेट अभियान पर तमाचा
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हाल ही में जिला प्रशासन द्वारा हेलमेट को लेकर सख्त अभियान चलाया जा रहा है। जगह-जगह जागरूकता कार्यक्रम, चेकिंग और चालान की कार्रवाई की जा रही है। ऐसे में एक शासकीय स्कूल से बिना किसी परमिशन और बिना हेलमेट रैली निकलना प्रशासनिक प्रयासों पर सीधा तमाचा माना जा रहा है। यह रैली केवल प्रतीकात्मक नहीं थी बल्कि वास्तविक खतरे से भरी हुई थी। मुख्य सड़क पर ट्रैक्टर और बाइक का काफिला वह भी बिना सुरक्षा साधनों के किसी भी बड़े हादसे को न्योता दे सकता था। अगर इस दौरान कोई दुर्घटना हो जाती तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता? स्कूल, शिक्षक, प्राचार्य या शिक्षा विभाग?

स्कूल प्रबंधन की भूमिका संदिग्ध
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नियमों के अनुसार स्कूल परिसर में होने वाले हर आयोजन की जानकारी और अनुमति प्राचार्य और स्कूल प्रबंधन के अधीन होती है। बिना उनकी जानकारी के न तो कोई बड़ा कार्यक्रम हो सकता है, न ही वाहन रैली जैसा आयोजन। ऐसे में यह मानना कि जिम्मेदारों को इस आयोजन की भनक तक नहीं लगी अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

क्या यह आयोजन अचानक हुआ?
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क्या शिक्षकों की सहमति के बिना बच्चे ट्रैक्टर और बाइक लेकर स्कूल आ गए? क्या मुख्य सड़क पर रैली निकलते समय किसी ने उन्हें देखा नहीं? इन सभी सवालों के जवाब तलाशना अब जरूरी हो गया है।

प्राचार्य का बयान,लेकिन सवाल बरकरार
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इस पूरे मामले पर जब शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय गुडरु के प्राचार्य गणेश लिल्हारे से दूरभाष पर बात की गई तो उन्होंने कहा की 12वीं के बच्चों की विदाई देने हेतु कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। आपके माध्यम से पता चला है कि बाइक एवं ट्रैक्टर से रैली निकाली गई है, जिसकी मुझे जानकारी नहीं है। मैं कुछ काम से बाहर गया था। बाद में जब स्कूल आया तो देखा ट्रैक्टर और बाइक परिसर में खड़ी थीं, जिसे मैंने हटाने को कहा। रैली की मुझे जानकारी नहीं है। मैं भी चाहूंगा कि इसकी जांच होनी चाहिए। प्राचार्य का यह बयान जहां एक ओर मामले से दूरी बनाता नजर आता है, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश भी दिखाई देता है। क्योंकि सवाल यह है कि अगर प्राचार्य बाहर थे, तो उनकी अनुपस्थिति में स्कूल की जिम्मेदारी किसके पास थी? क्या किसी प्रभारी शिक्षक की ड्यूटी नहीं थी? और अगर थी, तो उसने इस आयोजन को कैसे होने दिया?

बच्चों की जान से खिलवाड़
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यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं है। ट्रैक्टर और बाइक रैली सीधे तौर पर बच्चों की जान से खिलवाड़ है। स्कूल के छात्र नाबालिग भी हो सकते हैं, जिनके लिए वाहन चलाना ही नियमों के खिलाफ है। बिना हेलमेट बाइक चलाना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि जानलेवा भी साबित हो सकता है। अगर इस दौरान कोई दुर्घटना हो जाती तो पूरा प्रशासन और शिक्षा विभाग कटघरे में खड़ा होता। लेकिन हादसा न होने से क्या जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? जवाब साफ है नहीं।

जांच जरूरी, कार्रवाई उससे भी ज्यादा
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अब यह मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं रहा। यह पूरे शिक्षा तंत्र की लापरवाही को उजागर करता है। जरूरत है कि इस आयोजन की निष्पक्ष जांच हो जिम्मेदार शिक्षक और स्टाफ की भूमिका तय की जाए स्कूल प्रबंधन की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए भविष्य में ऐसे आयोजनों पर सख्त प्रतिबंध लगाया जाए। सिर्फ जांच के नाम पर फाइलें दबा देना इस समस्या का हल नहीं है। अगर शिक्षा के मंदिर में ही कानून का मजाक उड़ाया जाएगा, तो समाज से कानून पालन की उम्मीद करना बेमानी होगा।

सवाल जो प्रशासन से जवाब मांगते हैं
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क्या शिक्षा विभाग इस मामले को गंभीरता से लेगा? क्या जिम्मेदार शिक्षकों पर कार्रवाई होगी या मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा? क्या बच्चों को नियम सिखाने वाले खुद नियम मानेंगे? गुडरु स्कूल की यह घटना एक चेतावनी है अगर अब भी सख्ती नहीं बरती गई तो आने वाले समय में ऐसे लापरवाह आयोजन किसी बड़ी त्रासदी में बदल सकते हैं। शिक्षा के मंदिर में अनुशासन की पुनर्स्थापना अब वक्त की मांग है।