रघोली ग्राम पंचायत में सरपंच और सचिव की मनमानी: स्थानीय मजदूरों को ठेंगा, बाहरी मजदूरों को ठेका!
06 Feb, 2026
141 व्यूज
नायक दर्पण/बालाघाट।
•••••••••••••••••••••••••••
जनपद पंचायत बिरसा के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत रघोली में सरपंच और सचिव की जोड़ी ने स्थानीय निवासियों के साथ ऐसा विश्वासघात किया है कि गांव के लोग अब सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गए हैं। स्वच्छ भारत अभियान के तहत साफ-सफाई के कार्यों में बालाघाट और बैहर से लाए गए मजदूरों को काम दिया जा रहा है, जबकि गांव के अपने ही बेरोजगार युवा और मजदूर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। यह न केवल स्थानीय रोजगार नीति का खुला उल्लंघन है, बल्कि सरपंच और सचिव की भ्रष्टाचार भरी साजिश का जीता-जागता प्रमाण है। क्या यह पंचायत नहीं बल्कि इनकी निजी जागीर बन गई है? क्या गांव के लोगों की मेहनत और हक को यूं ही कुचला जाएगा? यह समाचार इनकी काली करतूतों को बेनकाब करने के लिए है, ताकि जनता जागे और इन जैसे भ्रष्ट तत्वों को सत्ता से बाहर फेंके!
रघोली गांव जो बालाघाट जिले की सीमाओं में बसा एक छोटा सा लेकिन मेहनती लोगों से भरा गांव है, आजकल सरपंच और सचिव की वजह से बदनामी का शिकार हो रहा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार स्वच्छता कार्य के नाम पर लाखों रुपये का बजट आया है, लेकिन इसका फायदा गांव के निवासियों को नहीं बल्कि दूर-दराज के मजदूरों को दिया जा रहा है। गांव के दर्जनों युवा जो मनरेगा और अन्य योजनाओं के तहत काम की उम्मीद लगाए बैठे हैं, उन्हें दरकिनार कर दिया गया है। एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया हमारे गांव के मजदूर भूखे मर रहे हैं, लेकिन सरपंच जी बालाघाट से मजदूर ला रहे हैं। क्या हमारा गांव इनका ठेका है कि जहां से चाहें मजदूर बुला लें?
यह मामला सिर्फ रोजगार का नहीं बल्कि भेदभाव और भ्रष्टाचार का है। पंचायती राज अधिनियम के अनुसार ग्राम पंचायत में किसी भी कार्य के लिए प्राथमिकता स्थानीय निवासियों को दी जानी चाहिए। लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। बैहर और बालाघाट से आए मजदूरों को न केवल काम दिया जा रहा है, बल्कि उन्हें ऊंची मजदूरी और अतिरिक्त सुविधाएं भी प्रदान की जा रही हैं। क्या यह सरपंच और सचिव की मिलीभगत से हो रहा है? क्या इन बाहरी मजदूरों से कोई कमीशन या रिश्वत का खेल चल रहा है? गांव के लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर क्यों स्थानीय मजदूरों को काम नहीं मिल रहा? क्या वे अक्षम हैं? नहीं बल्कि सरपंच और सचिव की नजर में वे अपने नहीं हैं, इसलिए उन्हें बाहर रखा जा रहा है।
इस घोटाले की जड़ें गहरी हैं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत ग्राम पंचायत को मिलने वाला फंड सीधे सरपंच और सचिव के हाथों में जाता है। लेकिन यहां फंड का दुरुपयोग हो रहा है। सूत्र बताते है पिछले छह महीनों में साफ-सफाई के कार्यों पर लाखो रुपये खर्च किए गए हैं, लेकिन इसका हिस्सा भी स्थानीय मजदूरों तक नहीं पहुंचा। इसके बजाय बाहरी मजदूरों को काम देकर सरपंच, सचिव अपनी जेबें भर रहे हैं। गांव के एक बुजुर्ग ने गुस्से में कहा ये सरपंच और सचिव गांव के दुश्मन हैं। वे हमारे बच्चों को बेरोजगार रखकर बाहरियों को अमीर बना रहे हैं। क्या यही है विकास का मॉडल?
सरपंच की भूमिका यहां सबसे ज्यादा संदिग्ध है। चुनाव के समय उन्होंने वादा किया था कि गांव के हर हाथ को काम मिलेगा, हर घर में खुशहाली आएगी। लेकिन सत्ता में आते ही उन्होंने अपना रंग बदल लिया। अब वे गांव की सड़कों पर घूमते हैं, लेकिन स्थानीय मजदूरों की सुध नहीं लेते। सचिव तो और भी बड़ा खिलाड़ी है। वह कागजों में हेराफेरी कर बाहरी मजदूरों के नाम दर्ज करवा रहा है। क्या यह कानून का मजाक नहीं? मनरेगा के नियमों के अनुसार 100 दिनों का रोजगार हर मजदूर को मिलना चाहिए, लेकिन यहां तो गांव के मजदूरों को 10 दिन का भी काम नहीं मिल रहा। इसके बजाय बालाघाट से आए मजदूरों को काम दिया जा रहा है।
गांव की महिलाएं भी इस अन्याय से आहत हैं। रघोली की कई महिलाएं जो घर चलाने के लिए मजदूरी पर निर्भर हैं, अब भुखमरी के कगार पर हैं। दूरभाष पर एक महिला ने रोते हुए बताया हमारे पति और बच्चे काम मांगते हैं, लेकिन सरपंच, सचिव कहते हैं कि काम नहीं है। लेकिन रोज देखते हैं कि बैहर से मजदूर आते हैं और सफाई करते हैं। क्या हमारा गांव इनका गुलाम है? यह स्थिति न केवल आर्थिक है, बल्कि सामाजिक भी स्थानीय मजदूरों में असंतोष बढ़ रहा है, और अगर जल्दी कार्रवाई नहीं हुई तो गांव में आदोलन जैसी स्थिति बन सकती है।
जिला प्रशासन, पंचायती राज विभाग और स्वच्छ भारत मिशन के अधिकारी इसकी जांच करें। सरपंच और सचिव के खिलाफ एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। क्या वे सोचते हैं कि गांव के लोग चुप रहेंगे? नहीं अब समय आ गया है कि इनकी मनमानी बंद हो। गांव के लोग एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं। वे कहते हैं कि अगर स्थानीय मजदूरों को काम नहीं मिला तो पंचायत भवन पर ताला लगाया जाएगा।
यह घोटाला सिर्फ रघोली तक सीमित नहीं है। पूरे बालाघाट जिले में ऐसी कई पंचायतें हैं जहां सरपंच और सचिव मिलकर फंड लूट रहे हैं। लेकिन रघोली का मामला सबसे ज्यादा घिनौना है क्योंकि यहां स्थानीय लोगों को जानबूझकर दरकिनार किया जा रहा है। जनता को जवाब चाहिए।
अब बात करते हैं समाधान की सबसे पहले सरपंच और सचिव को निलंबित किया जाए। उनकी संपत्ति की जांच हो। बाहरी मजदूरों को वापस भेजा जाए और स्थानीय मजदूरों को प्राथमिकता दी जाए। मनरेगा के तहत जॉब कार्ड धारकों को तुरंत काम मिले। गांव में एक जांच समिति बने जिसमें स्थानीय लोग शामिल हों। अगर अधिकारी चुप रहे तो यह अन्याय और बढ़ेगा।
रघोली के लोग अब जाग चुके हैं। वे कहते हैं कि सरपंच और सचिव की जोड़ी ने गांव को लूट लिया है। इनके खिलाफ तीखा विरोध जरूरी है। क्या यह लोकतंत्र है जहां चुने हुए प्रतिनिधि ही जनता को ठगें? नहीं यह भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है। सरपंच जी, अगर आप पढ़ रहे हैं तो सुन लीजिए आपकी कुर्सी अब डगमगा रही है। सचिव महोदय, आपके कागजी खेल अब खत्म होने वाले हैं। जनता अब चुप नहीं रहेगी।
इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है। हमारी टीम इस अन्याय को उजागर करेंगे। रघोली के मजदूरों की आवाज बनेगी। अगर जरूरत पड़ी तो हम उच्च न्यायालय तक जाएंगे। लेकिन सरपंच और सचिव को चेतावनी अब सुधर जाओ वरना जनता तुम्हें कभी माफ नहीं करेगी।
शेयर करें
लिंक कॉपी हो गया!