वन भूमि पर चयनात्मक कार्रवाई? महाराजपुर में एक परिवार का आशियाना ढहा, उठे दोहरी कार्यवाही के आरोप।
14 Feb, 2026
52 व्यूज
नायक दर्पण/बालाघाट। दक्षिण सामान्य वन मंडल बालाघाट के अंतर्गत वारासिवनी रेंज के ग्राम महाराजपुर में वन विभाग द्वारा वन भूमि पर बने एक आवास को अतिक्रमण बताकर तोड़ने की कार्रवाई से हड़कंप मच गया है। पीड़ित मिथलेश पति कोमल ने वन विभाग पर दोहरी कार्यवाही का आरोप लगाते हुए सवाल उठाए हैं कि जब उसी क्षेत्र में अन्य ग्रामीणों के पक्के मकान और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने घर भी खड़े हैं, तो फिर केवल उनके ही मकान पर बुलडोजर क्यों चला?
पीड़ित परिवार का कहना है कि उनके घर में पति-पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं। रहने के लिए न तो स्वयं की जमीन है और न ही पक्का मकान। वे कुछ समय से भाई के घर में रह रहे थे, लेकिन पारिवारिक विवाद के चलते उन्हें वहां से भी निकलना पड़ा। बेघर हुए दंपति ने स्थानीय पंचायत से मदद की गुहार लगाई। मिथलेश के अनुसार सरपंच ने उन्हें बताया कि जिस वन भूमि पर कई लोग पहले से मकान बनाकर रह रहे हैं, वहीं वे भी अपना छोटा सा घर बना लें। हमें कहा गया कि यहां कई लोगों ने मकान बनाए हैं, कोई दिक्कत नहीं होगी, पीड़िता ने मीडिया से कहा।
परिवार का दावा है कि जब वे मकान बना रहे थे, तब वन विभाग की ओर से किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं की गई। निर्माण कार्य खुलेआम चलता रहा। लेकिन जैसे ही मकान बनकर तैयार हुआ, वन अमले ने पहुंचकर उसे अतिक्रमण बताते हुए तोड़ दिया। अगर यह अवैध था तो पहले क्यों नहीं रोका? बन जाने के बाद ही कार्रवाई क्यों? यह सवाल अब गांव में भी गूंज रहा है।
ग्रामीणों के मुताबिक महाराजपुर में लगभग आधा दर्जन पक्के मकान और कुछ पीएम आवास योजना के तहत बने घर भी उसी कथित वन भूमि पर खड़े हैं। आरोप है कि उन मकानों को न तो नोटिस दिया गया और न ही तोड़फोड़ की गई। इस चयनात्मक कार्रवाई ने विभाग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ित परिवार का आरोप है कि अन्य अतिक्रमणकारियों से साठगांठ के कारण उनके मकान को ही निशाना बनाया गया।
कानूनी रूप से वन भूमि पर अतिक्रमण हटाना विभाग की जिम्मेदारी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कार्रवाई समान रूप से की गई? यदि क्षेत्र में कई निर्माण अवैध हैं, तो क्या सबके विरुद्ध एकसमान कदम उठाए गए? स्थानीय लोगों का कहना है कि एक गरीब परिवार का घर तोड़ देना आसान है, मगर प्रभावशाली लोगों पर हाथ डालना मुश्किल। यही धारणा प्रशासन की छवि को प्रभावित कर रही है।
पीड़ित परिवार अब मुआवजे और पुनर्वास की मांग कर रहा है। उनका कहना है कि सरपंच के कथित मार्गदर्शन में उन्होंने घर बनाया, इसलिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। हमारा घर तोड़ दिया अब हमारे बच्चों का क्या होगा? हमें मुआवजा कौन देगा? मिथलेश की यह पीड़ा प्रशासन के लिए बड़ा सवाल है। फिलहाल परिवार रिश्तेदारों के यहां अस्थायी रूप से रहने को मजबूर है।
इस मामले ने पंचायत और वन विभाग दोनों की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि पंचायत प्रतिनिधि ने वास्तव में वन भूमि पर निर्माण की मौखिक अनुमति दी, तो क्या यह अधिकार क्षेत्र से बाहर का कदम नहीं था? वहीं, यदि वन विभाग को निर्माण की जानकारी पहले से थी, तो समय रहते रोकथाम क्यों नहीं की गई? विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में स्पष्ट सीमांकन, पूर्व सूचना और वैकल्पिक व्यवस्था की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, ताकि मानवीय संकट न उत्पन्न हो।
ग्राम महाराजपुर में अब माहौल गरम है। ग्रामीणों की मांग है कि या तो सभी अवैध निर्माणों पर समान कार्रवाई हो या फिर पीड़ित परिवार को न्याय और पुनर्वास दिया जाए। प्रशासन के उच्च अधिकारियों से निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कार्रवाई नियमसम्मत और निष्पक्ष थी या नहीं।
वन विभाग की ओर से आधिकारिक बयान आना अभी शेष है। यदि विभाग के पास वैध दस्तावेज और नोटिस की प्रक्रिया का रिकॉर्ड है, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए ताकि भ्रम दूर हो सके। फिलहाल, एक गरीब परिवार का आशियाना ढह चुका है और न्याय की आस में उसकी निगाहें प्रशासन की ओर टिकी हैं।
शेयर करें
लिंक कॉपी हो गया!