नियमों की धज्जियां या पारिवारिक लाभ? सेवा सहकारी समिति बेनी में बेटे की ‘सीधी एंट्री’ पर उठे सवाल।

04 Apr, 2026 368 व्यूज
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नायक दर्पण/बालाघाट।
जिले की खैरलांजी तहसील अंतर्गत आने वाली सेवा सहकारी समिति मर्यादित बेनी पं.क. 9/52 एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है। समिति के प्रबंधक के.डी. मात्रे पर गंभीर आरोप लगे हैं कि उन्होंने नियमों को ताक पर रखते हुए अपने ही पुत्र को समिति में नियुक्त कर लिया। इस पूरे मामले ने न केवल सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बल्कि पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर भी गहरे संदेह पैदा कर दिए हैं।
सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2023 में समिति के प्रबंधक के.डी. मात्रे ने अपने पुत्र सुनील मात्रे को समिति में नौकरी पर रख लिया। आरोप है कि इस नियुक्ति के लिए न तो कोई विज्ञापन जारी किया गया और न ही किसी प्रकार की खुली चयन प्रक्रिया अपनाई गई। सामान्यतः सहकारी समितियों में नियुक्तियों के लिए शासन द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन आमंत्रित किए जाते हैं। पात्रता के आधार पर चयन होता है और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से संचालित की जाती है। लेकिन यहां इन सभी नियमों को दरकिनार कर सीधे तौर पर नियुक्ति कर दी गई।
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि यह नियुक्ति पूरी तरह से नियम विरुद्ध है और इसमें विभागीय अधिकारियों की भी कथित मिलीभगत हो सकती है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल एक व्यक्ति द्वारा नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता को उजागर करता है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर बिना किसी प्रक्रिया के की गई नियुक्ति पर संबंधित अधिकारियों ने अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की।
ग्रामीणों और समिति से जुड़े सदस्यों के बीच भी इस मामले को लेकर नाराजगी देखी जा रही है। उनकी माने तो यदि नियुक्तियां इसी प्रकार पारिवारिक आधार पर की जाएंगी तो योग्य और जरूरतमंद युवाओं को अवसर कैसे मिलेगा? सहकारी संस्थाओं का मूल उद्देश्य ही ग्रामीणों को रोजगार और सुविधा उपलब्ध कराना होता है। लेकिन यदि वहां भी पक्षपात और भाई-भतीजावाद हावी हो जाए तो यह उद्देश्य पूरी तरह से विफल हो जाता है।
जानकारों की मानें तो सहकारी समितियों में नियुक्ति के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश होते हैं। इनमें पद का विज्ञापन, पात्रता मापदंड, चयन समिति का गठन और मेरिट के आधार पर चयन शामिल होता है। लेकिन बेनी समिति के इस मामले में इन सभी प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई है। इससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि कहीं यह सब कुछ सुनियोजित तरीके से तो नहीं किया गया।
मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि नियुक्ति वर्ष 2023 में हुई थी। तो अब तक इस पर कोई जांच क्यों नहीं बैठाई गई? क्या संबंधित विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी या फिर जानबूझकर अनदेखी की गई? यदि विभाग को जानकारी थी और फिर भी कार्रवाई नहीं हुई तो यह प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण माना जाएगा।
इस पूरे प्रकरण ने सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करने वाला तंत्र यदि खुद ही नियमों की अनदेखी करे तो आम जनता का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां सहकारी समितियां किसानों और आम नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वहां इस तरह के मामलों का सामने आना चिंताजनक है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या इस नियुक्ति की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
फिलहाल बेनी की सेवा सहकारी समिति में हुई इस कथित नियुक्ति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।नियमों की अनदेखी क्यों हुई, किसके संरक्षण में यह सब संभव हुआ और आखिर जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी? इन सवालों के जवाब अब प्रशासन को देने होंगे। क्योंकि मामला केवल एक नियुक्ति का नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।