मीनाक्षी नटराजन का नामांकन क्यों हुआ रद्द..? जानिए क्या कहता है चुनाव कानून और सुप्रीम कोर्ट का नियम विद्वान अधिवक्ता नवीन आहूजा ने समझाया पूरा मामला

11 Jun, 2026 504 व्यूज
Main Photo
सिवनी नायक दर्पण


मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज होने के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। ऐसे में सिवनी जिले के विद्वान अधिवक्ता नवीन आहूजा ने इस पूरे मामले के सटीक कानूनी और तकनीकी तथ्य सामने रखे हैं जिससे साफ होता है कि रिटर्निंग ऑफिसर का यह फैसला पूरी तरह नियम सम्मत और कानूनी दायरे में है।

क्या है पूरा मामला..? सिर्फ नोटिस या लंबित केस..? शुरुआती चर्चाओं में यह बात सामने आ रही थी कि मीनाक्षी नटराजन को केवल एक सामान्य नोटिस मिला था, लेकिन कानूनी दस्तावेज कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। अगस्त 2025 में हैदराबाद की 'फोर्थ एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट' कोर्ट में उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता BNS की विभिन्न धाराओं के तहत एक आपराधिक शिकायत क्रिमिनल कंप्लेंट दर्ज की गई थी। कोर्ट ने इस शिकायत पर संज्ञान Cognizance लेते हुए सितंबर 2025 में मीनाक्षी नटराजन को एक औपचारिक न्यायिक समन Notice to Respondent जारी किया था, जिसका जवाब भी उनकी तरफ से अक्टूबर 2025 में अदालत में दाखिल किया जा चुका है।

हलफनामे में कहाँ हुई चूक..?
चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, नामांकन दाखिल करते समय हर उम्मीदवार को 'फॉर्म 26' में एक शपथ पत्र देना होता है। इस शपथ पत्र में देश की किसी भी अदालत में लंबित हर उस मामले की जानकारी देना अनिवार्य है, जिस पर कोर्ट संज्ञान ले चुका हो। चूंकि हैदराबाद की अदालत से उन्हें नोटिस मिल चुका था और कानूनी प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी इसलिए तकनीकी रूप से यह मामला "अदालत में लंबित" Pending श्रेणी में आता था। मीनाक्षी नटराजन ने अपने हलफनामे में इस केस का उल्लेख नहीं किया। स्क्रूटनी के दौरान विपक्ष के वकीलों ने कोर्ट के इन आदेशों की प्रमाणित प्रति Certified Copy रिटर्निंग ऑफिसर के सामने पेश कर दी।

क्या कहता है चुनाव कानून..? क्यों सही है फैसला..? सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2002 के एडीआर केस और 2013 के रिसर्जेंस इंडिया केस में साफ कहा है कि मतदाताओं को उम्मीदवार के आपराधिक इतिहास को जानने का पूरा अधिकार है। हलफनामे में जानकारी छुपाना जनता के संवैधानिक अधिकार का हन है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 36 के तहत रिटर्निंग ऑफिसर RO को यह स्पष्ट अधिकार है कि यदि नामांकन पत्र या हलफनामे में कोई 'गंभीर प्रकृति की खामी' Defect of Substantial Character यानी जानकारी छुपाने का मामला सामने आता है, तो वह नामांकन को तुरंत रद्द कर सकता है।