​​ठेकेदार मालामाल, जनता बेहाल, गुणवत्ता को ताक पर रखकर बनी सड़क, दरारों में दफन हुआ करोड़ों का बजट। गारंटी 5 साल की, सड़क न टिकी 5 महीने भी बालाघाट में जनमन योजना के तहत बने निर्माण की खुली पोल

16 Jul, 2026 275 व्यूज
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प्रधानमंत्री जनमन ग्राम सड़क योजना के तहत बनी सड़क में खुली गुणवत्ता की पोल, निर्माण पूरा होने से पहले ही दरकी सड़क, जिम्मेदारों पर उठे सवाल।

नायक दर्पण/बालाघाट।
बालाघाट जिले में प्रधानमंत्री जनमन ग्राम सड़क योजना के तहत बनाए जा रहे सड़क निर्माण कार्य की गुणवत्ता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। बिठली से पड़रापानी (बैंगाटोला) तक लगभग 1.95 किलोमीटर लंबी एवं 1 करोड़ 5 लाख 3 हजार रुपये लागत की सड़क निर्माण परियोजना पहली ही बारिश की मार नहीं झेल सकी। जहाँ पुलिया बना है वह जगह भी नीचे दब गई है सड़क पर जगह-जगह गहरी दरारें पड़ गई हैं, डामर की परत उखड़ने लगी है और कई हिस्सों में सड़क धंसती दिखाई दे रही है। निर्माण कार्य पूरा होने से पहले ही सड़क की यह हालत भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण की कहानी खुद बयां कर रही है।
स्थल पर लगे सूचना बोर्ड के अनुसार सड़क निर्माण कार्य का प्रारंभ 10 अक्टूबर 2025 से किया गया था तथा निर्माण एजेंसी मध्यप्रदेश ग्राम सड़क विकास प्राधिकरण की परियोजना क्रियान्वयन इकाई (1) है बोर्ड पर ठेकेदार द्वारा 5 वर्ष की गारंटी का भी उल्लेख किया गया है। लेकिन तस्वीरें इस गारंटी की वास्तविकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।
स्थानीय लोगों ने कैमरे में ना आने और नाम ना छापने के शर्त में आरोप लगाते हुए कहाँ है कि सड़क निर्माण के दौरान गुणवत्ता मानकों की खुलेआम अनदेखी की गई। सड़क की मजबूत नींव तैयार किए बिना ही जल्दबाजी में डामरीकरण कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि हल्की बारिश के बाद ही सड़क पर लंबी-लंबी दरारें उभर आईं। कई स्थानों पर डामर की परत टूटकर अलग हो चुकी है, जिससे कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।
उन्होंने कहाँ कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सड़क की हालत देखकर ऐसा लगता है मानो निर्माण कार्य वर्षों पुराना हो। यदि निर्माण के शुरुआती दौर में ही सड़क टूटने लगे तो आने वाले वर्षों में इसकी स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। लोगों का आरोप है कि सरकारी धन का दुरुपयोग कर केवल कागजों में गुणवत्तापूर्ण निर्माण दिखाने का प्रयास किया गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब निर्माण कार्य के दौरान विभागीय इंजीनियरों और अधिकारियों की नियमित निगरानी होनी चाहिए थी। तब ऐसी गंभीर खामियां कैसे रह गईं? क्या निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की जांच की गई थी? क्या संबंधित अधिकारियों ने मौके पर निरीक्षण किया था या फिर सब कुछ केवल फाइलों तक सीमित रहा?
तस्वीरों में साफ दिखाई दे रहा है कि सड़क के बीचों-बीच चौड़ी दरारें पड़ चुकी हैं। यदि समय रहते इनकी मरम्मत नहीं की गई तो बारिश के मौसम में पूरी सड़क क्षतिग्रस्त हो सकती है। इससे क्षेत्र के ग्रामीणों को आवागमन में भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा और दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाएगा।
जागरूक ग्रामीणों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराने निर्माण सामग्री के सैंपल की प्रयोगशाला में जांच करवाने तथा दोषी ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि करोड़ों रुपये की योजनाओं में इसी तरह लापरवाही और भ्रष्टाचार होता रहा तो ग्रामीण क्षेत्रों के विकास का दावा केवल बोर्डों तक ही सीमित रह जाएगा।
अब देखने वाली बात यह होगी कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले को गंभीरता से लेते हैं या फिर यह सड़क भी भ्रष्टाचार की फाइलों में दबकर रह जाएगी। फिलहाल सड़क पर पड़ी दरारें यह सवाल जरूर पूछ रही हैं कि क्या जनता के टैक्स का पैसा विकास पर खर्च हुआ या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया?