लखनादौन में दशलक्षण महापर्व पर मुनि श्री निर्वेगसागर जी का प्रवचन....उपवास को कष्ट नहीं, आत्मकल्याण की साधना समझें....!
22 Sep, 2026
15 व्यूज
लखनादौन/सिवनी नायक दर्पण
दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत उत्तम तप धर्म के अवसर पर मुनि श्री 108 निर्वेगसागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को तप, संयम और आत्मजागृति का महत्व समझाया। प्रवचन में उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार में प्रवेश करना तो सीख जाता है, लेकिन कर्मों के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की कला भूल जाता है। धर्म इसी कला को सिखाता है और तप, संयम के माध्यम से कर्मों की निर्जरा का मार्ग प्रशस्त करता है।
मुनि श्री ने कहा कि सुख वस्तुओं के बढ़ने में नहीं, बल्कि इच्छाओं के घटने में है। जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि प्रत्येक इच्छा का पूरा होना आवश्यक नहीं है, तब उसके भीतर संतोष और शांति का जन्म होता है। उत्तम तप धर्म हमें परिग्रह और तृष्णा को कम कर आत्मा की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि तप का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मोह और तृष्णा को कम कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि जैसे मिट्टी अग्नि में तपकर दीपक का रूप धारण करती है, उसी प्रकार तप के ताप से आत्मा में पवित्रता और जीवन में आध्यात्मिक सुगंध प्रकट होती है।
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति बूढ़ा हो जाता है, लेकिन उसकी तृष्णा और इच्छाएं बूढ़ी नहीं होतीं। इसलिए दूसरों से तुलना करने के बजाय जो मिला है, उसमें संतोष रखना सीखना चाहिए। तप बंधे हुए कर्मों की निर्जरा का साधन है, इसलिए उपवास और संयम को कष्ट नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की साधना समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल संसार में आगे बढ़ने की शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें संस्कार, संयम और आत्मकल्याण का मार्ग भी दिखाना आवश्यक है। कर्मों का फल प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं भोगना पड़ता है, इसलिए वर्तमान में शुभ कर्म और आत्मसंयम का पुरुषार्थ करना चाहिए।
श्रावक संस्कार शिविर में चल रही व्रत, उपवास एवं संयम की साधना को इसी आध्यात्मिक संदेश से जोड़ा गया। मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि धर्म केवल पर्व तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन की दिशा और आचरण का हिस्सा बने।
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