हर घर नल पर हर घर प्यासा:आदिवासी इलाकों में जल जीवन मिशन की पोल खुली नल, टंकी और पाइप। कागज़ों में बहता पानी, ज़मीन पर सूखा सच। जल जीवन मिशन या जल संकट मिशन? बालाघाट में योजना बनी मज़ाक।

22 Jan, 2026 45 व्यूज
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संजय अजीत
नायक दर्पण/बालाघाट
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बालाघाट। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना का उद्देश्य देश के हर ग्रामीण परिवार को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना है। हर घर नल, हर घर जल का नारा देकर सरकार ने 2024 तक सभी गांवों में घर-घर नल कनेक्शन के माध्यम से स्वच्छ पानी पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 2028 कर दिया गया। लेकिन मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में इस योजना की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयान कर रही है। बालाघाट जिले के अधिकांश ग्राम पंचायतों में जल जीवन मिशन के तहत किए गए कार्य पूरी तरह फेल साबित हो रहे हैं। कागजों में गांव कवर हो चुके हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ग्रामीणों को आज भी शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो पा रहा है। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां लोग 21वीं सदी में भी नदी-नालों, झिरियों और असुरक्षित जल स्रोतों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं। बैहर जनपद के लहंगाकन्हार ग्राम पंचायत अंतर्गत ढूटीटोला की तस्वीर इस मिशन की असफलता का जीता-जागता उदाहरण है। यहां आदिवासी बैगा परिवारों के घरों तक नल कनेक्शन तो लगाए गए हैं, लेकिन वे नल केवल शोपीस बनकर रह गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि नलों में आज तक पानी नहीं आया। कई कनेक्शन अधूरे हैं कई में अब तक टोटियां तक नहीं लगाई गई हैं। लोग आज भी नालों और झिरियों का गंदा पानी पीने और दैनिक उपयोग में लाने को मजबूर हैं।

पानी टंकी का निर्माण सिर्फ दिखावा,धरातल पर काम नही
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ग्राम ढूटीटोला के ग्रामीणों में फग्गूलाल बैगा ने यह भी बताया कि गांव में वैकल्पिक पानी टंकी का निर्माण किया गया है, लेकिन वह भी अनुपयोगी साबित हो रही है। कहीं पाइपलाइन अधूरी है, तो कहीं मोटर चालू नहीं है। स्थिति यह है कि योजनाओं का क्रियान्वयन केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। घर घर नल कनेक्शन तो लगाये गये है लेकिन उनमें कभी पानी की बूंद तक नही टपकी। कुछ घरो में स्थापित किये गये नल कनेक्शनो को प्लेटफार्म भी रख रखाव के अभाव में क्षतिग्रस्त हो चुके है।

मीडिया से क्यो दूर भाग रहे बुद्धुलाल उईके
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इस योजना का बालाघाट जिले के उन आदिवासी ईलाको में क्रियान्वयन बेहद जरूरी है जहां पानी की किल्लत है और लोग कालान्तर में पेयजल को तरसने लगते है। उन गांवो में जलापूर्ति बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है, ताकि किसी का कंठ ना सूखे। ऐसे में सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) और संबंधित अधिकारियों की भूमिका आखिर क्या है? जिन अधिकारियों पर योजना को धरातल पर उतारने की जिम्मेदारी है, वही अधिकारी लापरवाही और उदासीनता का परिचय देकर हमेशा मीटिंग का बहाना बताकर मीडिया के सवालो से बचते रहते है। लेकिन उनके द्वारा अनेको समाचार पत्रो में प्रकाशित करवाई जा रही खबरे व आंकडे यह दर्शाते है कि धरातल पर तेजी से काम किया जा रहा है। लेकिन सच तो यह है कि धरातल में जल जीवन मिशन की कल्पना एक गुत्थी बनकर उलझी हुई है, जो शायद 2028 तक भी नही सुलझेगी।

बैहर क्षेत्र के लिये खत्म हुई पीएचई विभाग की संवेदनायें
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जिले भर में जल जीवन मिशन के तहत नल जल योजना का कार्य अधूरा पड़ा है। वही कार्यपालन यंत्री बुद्धूलाल उईके की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। गांव गांव संपर्क साधने के बाद सुत्र बताते है कि उनके गांव में कोई विभागीय टीम जांच करने या निरीक्षण करने नही आती। मतलब साफ है कि प्रभावित क्षेत्र के गांवो में न तो नियमित निरीक्षण हो रहा है न ही अधूरे कार्यों को पूरा कराने की कोई ठोस पहल दिखाई दे रही है। सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। लेकिन उसका लाभ जरूरतमंद आदिवासी परिवारों तक नहीं पहुंच पा रहा। यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि आदिवासी समाज के साथ अन्याय है। जिन योजनाओं का उद्देश्य जल आपूर्ति के क्षेत्र में जीवन स्तर सुधारना था वे योजनायें आज भ्रष्टाचार, लापरवाही और कुप्रबंधन की भेंट चढ़ती नजर आ रही हैं। यदि यही हाल रहा तो 2028 का लक्ष्य भी बालाघाट जिले में केवल आंकड़ों की बाजीगरी बनकर रह जाएगा। जरूरत है कि शासन-प्रशासन केवल फाइलों और रिपोर्टों से बाहर निकलकर जमीनी सच्चाई को समझे जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करे और यह सुनिश्चित करे कि जल जीवन मिशन, सच में हर घर जल का उद्देश्य बने न कि केवल एक अधूरी और खोखली योजना।