जब पिता को बेटे से भिक्षा नहीं,हक़ मांगना पड़े 21 साल की चुप्पी,एक आदेश और समाज के लिए आईना कभी जिन हाथों ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया कभी जिन कंधों ने अपने सपने ढोकर बेटे का भविष्य बनाया। उन्हीं हाथों को बुढ़ापे में न्यायालय के दरवाज़े खटखटाने पड़ें तो

23 Jan, 2026 85 व्यूज
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नायक दर्पण/बालाघाट।
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माता-पिता जीवन भर बच्चों के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन जब बुढ़ापा सहारे की तलाश करता है और वही सहारा दूर हो जाए तो दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल हो जाता है। बालाघाट में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां 70 वर्षीय वृद्ध पिता को अपने ही बेटे से जीवनयापन के लिए न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
हट्टा निवासी किशोर खांडेकर अपनी 65 वर्षीय पत्नी के साथ जीवन की संध्या में संघर्ष कर रहे थे। पत्नी हृदय रोग से पीड़ित है इलाज और रोजमर्रा की जरूरतें बढ़ती जा रही थीं, लेकिन उनका एक मात्र पुत्र मुकेश खांडेकर जो पुलिस विभाग में आरक्षक है, पिछले 21 वर्षों से माता-पिता से दूर रहा और किसी प्रकार का आर्थिक सहयोग नहीं दिया।
थक-हारकर वृद्ध पिता ने वृद्ध माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिकरण बालाघाट में आवेदन दिया। सुनवाई के दौरान सुलह अधिकारी बी.आर. भैरम के समक्ष दोनों पक्ष उपस्थित हुए। समझाइश के बाद बेटे के भीतर जिम्मेदारी का एहसास जागा और उसने स्वेच्छा से पिता को हर माह 7 हजार रुपये देने की सहमति दी। इस मानवीय पहल को कानूनी मजबूती देते हुए अधिकरण के अध्‍यक्ष एवं एसडीएम श्री गोपाल सोनी ने आदेश पारित किया कि आरक्षक मुकेश खांडेकर के वेतन से प्रतिमाह 7 हजार रुपये काटकर सीधे पिता के बैंक खाते में जमा कराए जाएं। यह फैसला केवल एक आदेश नहीं बल्कि उन तमाम बुज़ुर्गों के लिए उम्मीद की किरण है जो चुपचाप अपने ही बच्चों से उपेक्षा झेलते हैं। साथ ही यह समाज को यह याद दिलाता है कि माता-पिता का सहारा बनना केवल संस्कार नहीं संतान का कर्तव्य और कानूनन जिम्मेदारी भी है।यह आदेश चेतावनी है हर उस संतान के लिए
जो यह मान बैठी है कि माता-पिता की जिम्मेदारी उम्र के साथ खत्म हो जाती है।