मधु भगत की उदासीनता का सात साल पुराना स्मारक: भीकेवाड़ा में सामुदायिक भवन आज भी 'शिलान्यास' की कब्र में दफन! पूजन से प्रचार तक पर निर्माण से दूरी: भीकेवाड़ा का अधूरा सामुदायिक भवन बना ग्रामीणों के लिए सिरदर्द।

23 Jan, 2026 394 व्यूज
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नायक दर्पण/बालाघाट।
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जनपद पंचायत परसवाड़ा की ग्राम पंचायत भीकेवाड़ा में सामुदायिक भवन का सपना पिछले सात वर्षों से फाइलों, नारियल और शिलान्यास पट्टिकाओं में ही कैद होकर रह गया है। 2018 में तत्कालीन विधायक मधु भगत ने पूरे तामझाम के साथ जिस भवन का भूमिपूजन किया था, वह आज भी ईंट-सीमेंट का इंतजार कर रहा है। हैरानी की बात यह है कि सत्ता बदली,चेहरे बदले, मंत्री बने पर भीकेवाड़ा के ग्रामीणों की किस्मत नहीं बदली।
दरअसल 2018 में भूमिपूजन के बाद विधायक मधु भगत चुनाव हार गए। इसके बाद विधायक बने रामकिशोर कावरे जो राज्य मंत्री भी रहे। उम्मीद थी कि मंत्री पद की ताकत से अधूरा काम पूरा होगा,लेकिन सामुदायिक भवन उनकी प्राथमिकता सूची में कहीं नजर नहीं आया। वर्षों बीत गए फाइलें धूल खाती रहीं और गांव के लोग हर सामाजिक कार्यक्रम में खुले आसमान के नीचे व्यवस्थाएं करने को मजबूर रहे। अब जब फिर से विधायक मधु भगत सत्ता में हैं, तो ग्रामीणों को लगा कि शायद अब यह अधूरा सपना पूरा होगा। दो साल बीत चुके हैं पर स्थिति जस की तस है। न निर्माण शुरू हुआ न बजट की कोई ठोस जानकारी सामने आई न ही जिम्मेदारों ने गांव पहुंचकर हालात का जायजा लिया। सवाल यह है कि क्या सामुदायिक भवन केवल चुनावी मंच, फोटो और भाषणों तक ही सीमित रहता है? भीकेवाड़ा जैसे ग्रामीण क्षेत्र में सामुदायिक भवन कोई लग्ज़री नहीं बल्कि बुनियादी जरूरत है। शादी-विवाह, अंतिम संस्कार के बाद की बैठकें, सामाजिक आयोजनों, महिला स्व-सहायता समूहों की बैठकें, सरकारी योजनाओं की ग्राम सभा हर काम के लिए एक सुरक्षित और स्थायी जगह जरूरी होती है। भवन न होने के कारण ग्रामीणों को कभी स्कूल परिसर, कभी किसी के निजी आंगन, तो कभी तिरपाल के नीचे कार्यक्रम करना पड़ता है। बरसात और गर्मी में स्थिति और भी बदतर हो जाती है। ग्रामीणों का आरोप है कि जनप्रतिनिधि गांव में आते तो हैं पर केवल भाषण और आश्वासन देकर चले जाते हैं। सामुदायिक भवन का मुद्दा उठाने पर हर बार जल्द काम शुरू होगा फंड स्वीकृत होने वाला है जैसे जुमले सुनने को मिलते हैं। लेकिन जमीन पर न मशीनें दिखती हैं न मजदूर न सामग्री। यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि ग्रामीणों के साथ सीधा खिलवाड़ है। सबसे बड़ा सवाल विधायक मधु भगत से यह है कि जब एक ही भवन का तीन-तीन बार राजनीतिक फायदा उठाया जा चुका है पहले भूमिपूजन, फिर सत्ता परिवर्तन, और अब पुनः सत्ता तो निर्माण क्यों नहीं? क्या सामुदायिक भवन केवल राजनीतिक रस्म अदायगी का साधन बन गया है? क्या गांवों के विकास का मतलब सिर्फ कागजी स्वीकृतियां और शिलान्यास तक सीमित रह गया है?
जानकारों कि माने तो यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जनप्रतिनिधि की गंभीरता हो तो ऐसे भवनों का निर्माण वर्षों नहीं महीनों में हो सकता है। लेकिन यहां तो सात साल से अधिक समय गुजर चुका है। यह देरी संयोग नहीं बल्कि साफ तौर पर उपेक्षा और प्राथमिकता की कमी को दर्शाती है। ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि यदि जल्द ही निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ तो वे जनपद और जिला स्तर पर आंदोलन करने को मजबूर होंगे। गांव की महिलाएं बुजुर्ग और युवा सभी इस मुद्दे पर एकजुट नजर आ रहे हैं। उनका सीधा सवाल है जब विधायक चुनाव के समय गांव-गांव घूमकर वोट मांग सकते हैं, तो फिर गांव की बुनियादी जरूरतों के लिए समय क्यों नहीं निकाल सकते? यह मामला केवल भीकेवाड़ा के सामुदायिक भवन का नहीं बल्कि ग्रामीण विकास के उस खोखले मॉडल का प्रतीक है जहां घोषणाएं बड़ी होती हैं और अमल शून्य। विधायक मधु भगत के लिए यह समय आत्ममंथन का है। अगर वे वास्तव में क्षेत्र के विकास के प्रति गंभीर हैं तो उन्हें तत्काल निर्माण कार्य शुरू कराना चाहिए। समयबद्ध योजना सार्वजनिक करनी चाहिए और ग्रामीणों को जवाब देना चाहिए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधायक मधु भगत की यह लापरवाही उनके जनहित के दावों की पोल खोलती है। अगर विधायक वास्तव में जनता के प्रति जवाबदेह होते तो दोबारा सत्ता में आने के बाद सबसे पहले ऐसे अधूरे कार्यों को प्राथमिकता देते। लेकिन अब तक न कोई निरीक्षण न कोई सार्वजनिक बयान और न ही कोई ठोस कार्यवाही सामने आई है। ग्रामीणों ने मांग की है कि इस मामले की जांच कराई जाए निर्माण में खर्च की गई राशि का ऑडिट हो और जिम्मेदार अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों पर कार्रवाई की जाए। सवाल यह भी है कि क्या विकास कार्य केवल शिलालेखों और भूमिपूजन तक सीमित रहेंगे या कभी जनता को उनका वास्तविक लाभ भी मिलेगा? भीकेवाड़ा का यह सामुदायिक भवन आज एक इमारत नहीं बल्कि विधायक मधु भगत की कार्यशैली पर लगा बड़ा सवालिया निशान बन चुका है। अन्यथा यह अधूरा सामुदायिक भवन विधायक की उपलब्धियों की नहीं बल्कि उनकी अनदेखी और उदासीनता की स्थायी पहचान बन जाएगा एक ऐसा स्मारक जो हर गुजरते दिन के साथ यह सवाल पूछता रहेगा कि पूजन तो हुआ वादे हुए पर गांव को आखिर मिला क्या?